Monday, September 1, 2014

वेदना के स्वर एवं इसकी स्वीकार्यता

वेदना क्या केवल स्वरों से?
मुख के हाव भाव व्यर्थ?
तुम्हे मेरे कहने की प्रतीक्षा?
मेरे चक्षुओं का प्रयास व्यर्थ?

तो लो, मै अपनी कहानी सुनाता हूँ,
और फिर प्रश्न उठाऊंगा; पूछूँगा तुमसे !!
क्या तुम बिना कहे नहीं समझ पाए?
या फिर यह केवल तुम्हारा चिर-परिचित स्वांग था?

पंख थे मेरे और मै उन्मुक्त उड़ता था !
बादलों से ठिठोली हवाओं संग खेलता था।
सतरंगी स्वप्नों के आलिंगन में रात होती थी,
अवसाद शून्य थे एवं भविष्य सुखद दिखता था।

विधि के विधान से अनभिज्ञ, मै मूढ़ !
भविष्य की योजनाओं को बुनता था.......!
संभवतः स्वयं को विधाता मान बैठा था!!!
भविष्य -मेरे अनुसार, कुछ ऐसा ही प्रतीत होता था। 

फिर एक दिन कुछ चुभा 
और स्वप्न बिखर गए 
वो सफेद बादल, वो पंख 
- सब, छिन्न भिन्न हो गए !! 

शारीरिक संवेदनाओं की तरंगे अवरुद्ध हो गयीं,
कशेरुकों के बीच आपस में एक युद्ध हो गयी। 
मष्तिष्क में स्वप्नों का सृजन बंद हो गया, 
और देखते ही देखते मेरी उड़ान रुक सी गयी।

योजनायें बन के एक कोने में पड़ी हुई 
मुझे चिढाती हुई, धूल खाती हुई। 
शारीरिक पीड़ा की चिंता नहीं थी,
मानसिक कुंठा, मन में अवसाद लाती हुई। 

कई वर्ष बीत गए, स्वयं से युद्ध करते हए 
इस समस्या को समझाते, और समझते हुए। 
हार नहीं माना हूँ, और ना कभी मानूंगा !!!
परन्तु आतंरिक वेदना से आज भी लड़ते हुए। 

सामाजिक जीवन में तो 
प्रसन्न रहता हूँ,
लोगों में खुशियाँ बांटता 
और हंसाता हूँ। 

बस एक तुच्छ सी प्रार्थना है,
जब भी वेदना के स्वर मुखर हों। 
मेरे बोलने की प्रतीक्षा किये बिना, 
आप सब मेरे साथ, मेरा आलंबन हों।

Monday, August 18, 2014

कृष्ण जन्माष्टमी

हर्ष, उल्लास, फैला चहुँ ओर,
देखो-देखो आया माखन चोर।

नटखट चाल, दधि, मुख पर सोभित,
श्याम रंग, सर पर पंख मोर।

प्रेमी, सखा, इष्ट, सारथि, रूप कई
जैसे चाहो पूजो तुम, पाप कटेंगे घोर।


Thursday, August 14, 2014

स्वतंत्रता दिवस और बचपन के दिन !!

हमारे जीवन में चाहे कितना भी दुःख क्यों ना हो, स्वतंत्रता दिवस का उत्सव अवश्य मनाना चाहिए। ये इस बात का प्रतीक है की हम सभी इस देश के प्रति कितने संवेदनशील और कृतज्ञ हैं। देश केवल भौगोलिक सीमा में बंधा हुआ एक भू-भाग नहीं वरन ये यहाँ जन्मे हुए हर व्यक्ति की एक पहचान है। हमारे यहाँ अपनी समस्यायें एवं मतभेद हैं परन्तु इस देश से बाहर हम सब "भारतवासी" के तौर पर ही जाने जाते हैं। मै यहाँ देशभक्ति पर प्रवचन नहीं देना चाहता बस अपने मन के अंदर की कुछ बातें और अनुभव साझा करना चाहता हूँ। 

मुझे अच्छी तरह से याद है कि जिस साल मेरा सरकारी प्राथमिक विद्यालय में दाखिला हुआ था, उस साल १५ अगस्त के दिन मुझे "नन्हा मुन्ना राही हूँ" गीत सिखा कर भेजा गया था (अब घर में किसने सिखाया था याद नहीं)। मुझे कुछ भी समझ नहीं थी कि १५ अगस्त या स्वतंत्रता दिवस के क्या मायने हैं परन्तु इस गीत पर खुद झूमते हुये मै आज भी याद कर सकता हूँ :) काफी समय तक ये गीत मेरा पसंदीदा रहा था और अभी पिछले सप्ताह ही मैंने ये गीत अपनी भतीजी को सिखाने का प्रयास किया। 

पता नहीं आप सब को कैसा लगेगा परन्तु एक बार के स्वतंत्रता दिवस समारोह (संभवतः कक्षा-६) में मैंने रामचरितमानस - उत्तर काण्ड से शिव स्तुति "नमामि शमीशान निर्वाण रूपं" याद कर के सुनाया था। उस समय घर पर हर बार कुछ ना कुछ नया सिखाया जाता था और विषय अधिकतर देशभक्ति एवं आध्यात्म से जुड़े होते थे। पूरा श्लोक सुनाने के बाद ऐसी अनुभूति हुई कि जैसे कोई कोई दुर्ग जीत लिया हो। 

कक्षा-३(या ४ याद नहीं) में पहली बार मुझे प्रभात फेरी का नेतृत्व करने का अवसर प्राप्त हुआ। करीब एक सप्ताह पहले मुझे ये बात मेरे प्रधानाध्यापक द्वारा बताई गयी थी। मेरी ख़ुशी कुछ ऐसी थी थी जैसे कि किसी खिलाड़ी को ओलम्पिक में अपने देश के खिलाड़ियों के दल का नेतृत्व करने में मिलती हो। प्रभात फेरी के लिए जो कविता निर्धारित की गयी थी वो थी द्वारका प्रसाद माहेश्वरी जी की "वीर तुम बढ़े चलो !! धीर तुम बढ़े चलो !!"  पूरे सप्ताह तैयारी चलती रही; बात बस इतनी नहीं थी कि कविता पूरी तरह से याद हो जाए, ध्यान इस पर भी था की जोश पूरी तरह से प्रकट होना चाहिए। घर पर काफी तैयारी करायी गयी और जब १५ अगस्त के दिन मै हाथ में तिरंगा लेकर अपनी गाँव की गलियों में निकला तो ऐसा लगा कि जैसे सबकी नज़र मेरे ऊपर ही है और मै एक राजा के जैसा महसूस कर रहा था। ये सिलसिला कक्षा-५ तक चला और हर स्वतंत्रता दिवस को मै एक छोटा-मोटा सलेब्रिटी तो बन ही जाता था :)

कक्षा-६,७ & ८ के दौरान मैंने हमेशा स्वतंत्रता दिवस पर भाषण प्रतियोगिता में भाग लिया और विषय अधिकतर मेरे पिता जी द्वारा सुझाये होते थे। इन तीन सालों में शायद एक बार मैंने प्रभात फेरी का नेतृत्व भी किया परन्तु विद्यालय अपने गाँव में ना होने के कारण वो आनंद नहीं आया :) किसी एक भाषण में मैंने अपने पिताजी द्वारा सुझाई २ पंक्तियाँ बोली थीं, मुख्य अतिथि ने मुझे रु.५०/- इनाम में दिया था। ये पंक्तियाँ थी:

फुटपाथ पर पड़ा था वो भूख से मारा था 
कपड़ा उठा कर देखा तो पेट पर लिखा था 
"सारे जहाँ से अच्छाहिन्दोस्ताँ हमारा - हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्ताँ हमारा

उनकी बताई एक और पंक्ति जो मुझे पसंद है (वैसे मुझे इन दोनों के रचयिता का नाम नहीं पता)

निर्माणों के पावन युग में युग निर्माण की बात न भूलें 
स्वार्थ साधना की आंधी में वसुधा का कल्याण ना भूलें। 

कक्षा-८ के बाद पता नहीं क्यूँ आगे मै स्वतंत्रता दिवस समारोहों में नहीं गया परन्तु हर साल मेरी माता जी के विद्यालय से उस दिन की मिठाई जरूर आती थी। मुझे आज भी इस बात का दुःख होता है कि मै कम से कम १२वीं कक्षा तक स्वतंत्रता दिवस समारोहों में जा सकता था, परन्तु पता नहीं क्यूँ मुझे ऐसा लगने लगा था कि बच्चों वाली मासूमियत कहीं छुप सी गयी थी। विश्वविद्यालय तक आते-२ तो सब कुछ गुम सा हो   ही नहीं चलता था की समारोह कहाँ है, कब है और कैसे पहुँचना है। 

इन सब के बाद भी एक प्रथा जो हमारे घर में आज भी मनायी जाती है - नववर्ष, जन्मदिवस जैसे त्योहारों की तरह हम स्वतंत्रता दिवस पर भी बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं। आशा बस यही करता हूँ कि हम स्वतंत्रता दिवस समारोह में भाग ले या ना लें, परन्तु अपने त्योहारों की तरह इसका भी सम्मान करें। किसी भी सरकार की जिम्मेदारी है कि वो एक बेहतर देश/समाज बनाने का हर संभव प्रयत्न करें परन्तु इससे हमारी खुद की जिम्मेदारी कहीं से भी कम नहीं होती:




जय हिन्द, जय भारत !

इस पोस्ट के माध्यम से अपनी कुछ पुरानी रचनाओं को आपके समक्ष प्रस्तुत करना चाहता हूँ:





Saturday, July 12, 2014

नए जीवन का आरम्भ - first days of my work (February 2006)

कई बार सोचा की इस अनुभव को आप लोगों के साथ साझा करूं, पर अक्सर ये दूसरी प्राथमिकताओं में कहीं पीछे छूट गया। आज फिर से याद आया और समय भी मिला तो प्रयास कर रहा हूँ। 

पिछले एक लेख में (मै और मेरा इलाहाबाद) मैंने अपनी स्नातक की पढ़ाई के बारे में संक्षेप में बताया है। उसके बाद मै जन-स्वास्थ्य (public health) के क्षेत्र में प्रबंधन (management) की पढाई करने के लिए 'भारतीय स्वास्थ्य प्रबंधन अनुसन्धान संस्थान, जयपुर (IIHMR, Jaipur) आ गया। अब ये कहानी कभी और सुनाऊंगा की गणित, भौतिकी और रसायन विज्ञान पढ़ने के बाद, मै जन-स्वास्थ्य प्रबंधन के क्षेत्र में कैसे आ गया। अभी मै आपको सीधे लिए चलता हूँ - फ़रवरी २००६; गुजरात राज्य के एक आदिवासी जिले 'नर्मदा' का मुख्यालय - राजपीपला। 

संस्थान की तरफ से campus placement कराने का भरपूर प्रयास हो रहा था, पर किन्ही कारणो वश, गुजरात सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने अपने मुख्यालय गांधीनगर में ही साक्षात्कार कराने का निर्णय लिया। ये घटना २ कारणों से महत्वपूर्ण थी - (१) हमारे संस्थान से पहली बार कोई सरकारी विभाग, इतने बड़े स्तर पर, placement कराने के लिए तैयार था और (२) गुजरात सरकार द्वारा, राष्ट्रिय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (National Rural Health Mission-NRHM) के अंतर्गत, जिला कार्यक्रम प्रबंधक (District Program Manager-DPM) के पद के लिए, बिना पूर्व-अनुभव वाले नौजवानो की नियुक्ति करने का प्रयास किया जा रहा था (यह एक क्रन्तिकारी और जोखिम भरा कदम था, परन्तु बाद में बहुत से राज्यों ने अपनाया). खैर जनवरी २००६ में हमारा साक्षात्कार हुआ और फरवरी के पहले सप्ताह में ही हमें कार्यभार ग्रहण करने के लिए कहा गया - मेरी तैनाती नर्मदा जनपद में हुई (यहाँ की ९०% से अधिक जनसँख्या आदिवासी है)।

गुजरात के बारे में अधिक कुछ तो नहीं पता था, पर सभी लोगों ने कम से कम एक बात जरूर कही की वहां खाने में मीठा मिलाया जाता है (वैसे गुजराती में मिठू का मतलब नमक होता है ;)। राजपीपला जाने के लिए मैं ४ फरवरी को अवध एक्सप्रेस से गोरखपुर से वडोदरा के लिए रवाना हुआ। ५ फरवरी की रात ९-१० बजे के करीब मै वडोदरा पहुंचा; रात भर स्टेशन पर ही आराम करने के बाद सुबह ८ बजे मै राजपीपला के लिए प्रस्थान किया, जो की वडोदरा से करीब ७५ किमी दूर है। १०:३० बजे के करीब मै राजपीपला बस स्टैंड पर उतरा। 

एक बहुत ही छोटा और पुराना सा दिखने वाला शहर, संकरी सड़कें, दुकान और घर एक दूसरे में मिले हुए, २ मुख्य सड़कें - एक काला घोड़ा चौराहे से बस स्टैंड के लिए और दूसरी कलेक्टर ऑफिस से शहर के तरफ जो की अंत में काला घोड़ा पर आकर मिलती है। शहर कुछ इतना ही बड़ा की आप पैदल चलते हुए एक सिरे से दूसरे सिरे तक २५-३० मिनट में पूरा कर सकते हैं। शहर को २ तरफ से करजन नदी ने घेर रखा है। शाम के समय छोटी पहाड़ियों के पीछे से छन कर आती रोशनी का नदी के पानी में इतराना बहुत ही सुन्दर लगता है। इतनी खूबसूरत जगह है की अगर में बयां करने की कोशिश करूँ तो एक पूरी किताब बन जाए। 


खैर, बस स्टैंड पर उतरने के बाद मैंने नियुक्ति पत्र पर दिए गए नंबर पर फ़ोन लगाया; अंग्रेजी में बात करने का प्रयास निरर्थक रहा और फ़ोन के दूसरी तरफ की हिंदी मेरे समझ में नहीं आई। करीब ३-४ प्रयासों के बाद मुझे बस इतना समझ आया कि मुझे जिल्ला (जिला नहीं) पंचायत की तरफ कूच करना है। गुजरात के लोगों की अच्छाई की बानगी मुझे वहीँ मिल गयी - जिस पीसीओ से मैंने फ़ोन किया था, उसके मालिक ने समझ लिया था की मै नया हूँ, उन्होंने खुद एक ऑटो रिक्शा मंगाया, मेरा सामान रखवाया, और अपने लड़के को मेरे साथ भेजा। बाद में इन्ही महाशय ने मुझे रहने के लिए घर भी दिलाया। आज भी इनके साथ सम्बन्ध कायम है।

पहले १-२ दिन में ही मुझे कुछ बातें समझ में आ गयी थी - लोग जिसे सम्मान देते हैं उस कप में नहीं प्याली में चाय पिलाते हैं :-) नमक को मिठू बोलते हैं, बड़े को मोटा भाई/बेन बोलते हैं, लड़कियां रात के १२ बजे भी बेधड़क घर से बाहर निकल सकती हैं, दाल में मीठा जरूर मिलाया जाता है और उतनी ही तीखी चटनी खाते हैं, बेसन ही उनका प्रमुख आहार है और लोगों को घर के बाहर का खाना कुछ ज्यादा ही पसंद आता है।

नौकरी की शुरुआत कुछ ज्यादा अच्छी नहीं रही, इसके २ कारण थे - (१) सरकारी व्यवस्था में यह पहला मौका था जब हम जैसे प्रबंधन के विद्यार्थी सीधे तौर पर नियुक्त किये गए थे (संविदा पर) (२) वहाँ के मुख्य जिल्ला आरोग्य अधिकारी (CDHO) को ऐसा लगता था की ये गुजरात से बाहर का व्यक्ति गुजरात की सरकारी व्यवस्था में एक प्रमुख पद पर कार्यरत नहीं होना चाहिए। इसके बाद की कहानी काफी लम्बी है पर संक्षेप में -

  • प्रारम्भ के ३-४ महीने मुझे बैठने के लिए स्थान नहीं दिया गया और ना ही कोई काम दिया गया 
  • मैंने कभी भी राज्य स्तर के अधिकारीयों से शिकायत नहीं की, क्योंकि मुझे ये पता था की अगर आगे निकलना है तो शिकायत से नहीं अपना स्थान बनाने से बात बनेगी 
  • ५ महीने बाद इस CDHO का तबादला किया गया - और इसमें मेरा भी योगदान था। गुजरात के स्वास्थ्य सचिव ने नए CDHO और मुझे इस जिले के सुधार की जिम्मेदारी सौंपी और करीब ८ महीनों में हम दोनों ने मिल कर काफी क्रांतिकारी निर्णय लिए और परिणाम दिखाए - इसी के फल स्वरुप मुझे १ साल में ही राज्य कार्यक्रम प्रबंधक (State Program Manager) बना दिया गया 
  • जमीनी स्तर पर सरकारी योजनाओं के नियोजन एवं कार्यान्वयन के गुर सीखे जो कि बाद में चल कर केंद्र सरकार में मेरे कार्यकाल के दौरान "नीति निर्माण" में सहयोगी बने 
  • जो सबसे बड़ी बात हुई वो यह है कि विपरीत परिस्थितियों में काम करने का एक आत्विश्वास पैदा हुआ जो कि आज भी मुझे आगे बढ़ने के प्रेरणा देता है। मेरे एक उच्चाधिकारी (District Development Officer, a young  IAS) ने कहा था  "अगर कुछ अच्छा काम किया है तो अपनी पीठ खुद थपथपाओ, और पहले खुद में विश्वास लाओ, दूसरे लोग बाद में साथ आ ही जायेंगे"। आज भी मै ये बात मानता हूँ और इसका अनुपालन करता हूँ।
गुजरात में मै २ साल रहा, एक साल जनपद स्तर पर तो अगला एक साल राज्य स्तर पर। NRHM में बहुत से ऐसे कार्य हुए जिनको प्रारम्भ कराने का श्रेय मुझे दिया गया, पर मै केवल यही कह सकता हूँ कि टीम बनाने एवं साथ काम करने की क्षमता ने ही मुझे आगे बढ़ाया। मेरे पिताजी हमेशा कहते हैं "अगर सार्वजानिक क्षेत्र में काम करना है तो हर श्रेणी के कर्मचारियों/अधिकारीयों का सहयोग ही आगे बढ़ाएगा"। गुजरात छोड़ने के बाद मैंने करीब ५ साल केंद्र सरकार में काम किया और करीब १.५ साल से विश्व बैंक के साथ काम कर रहा हूँ, परन्तु आज भी मै अपनी सफलता का पूरा श्रेय गुजरात में बिताये उन २ सालों को देता हूँ ,जिन्होंने मेरी नींव बनायीं। 

इस श्रंखला में मै समय मिलने पर कुछ और अनुभव साझा करूँगा, आशा है आपको गुजरात का एक संक्षेप वर्णन पसंद आया। 

Tuesday, June 3, 2014

सत्य (truth)

सत्य क्या है ?

जो आँखों के सामने घटित हुआ?
जो इतिहास के पन्नों में वर्णित हुआ?
जो विज्ञान के सिद्धांतो ने प्रमाणित किया?

शायद हां   !! शायद ना   !!

जो घटित हुआ, छलावा हो सकता है !
इतिहास के पन्नों में बदलाव हो सकता है !
विज्ञान के सिद्धांतो पर पुनर्विचार हो सकता है !

तो फिर सत्य क्या है?

ह्रदय का स्पंदन।
चिड़ियों का चहकना।
हवाओं का बहना।
सूरज का उगना।

अर्थ कुछ यूँ निकलता है-

प्रकृति सत्य है,
प्रकृति का सृष्टिकर्ता सत्य।
ईश्वर सत्य है,
ईश्वर का हर विधान सत्य।

शेष व्यक्तिपरक दृष्टिकोण की बातें है। 

Tuesday, May 20, 2014

झिंगुरी मिस्त्री - मेरे गाँव के महारथी !!

काफी दिनों से व्यस्तता और समयाभाव के कारण लिखना संभव नहीं हो पाया। आज सोचा कुछ लिखूं तो समझ नहीं आया - क्या?? बहुत सोच विचार कर मै अपने गाँव के "झिंगुरी मिस्त्री" की कहानी सुनाने जा रहा हूँ। एक बात मै शुरू में ही बता दूँ कि ये कोई कहानी नहीं है, बल्कि ये पूर्वी उत्तर प्रदेश के अधिकतर गाँवों की जीवन शैली का एक चित्र है।

जैसा की पहले भी बता चूका हूँ, मै पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव से आता हूँ। अगर मै ये बोलूं कि मेरा गाँव पूरे प्रदेश का एक प्रतिरूप है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी - यहाँ हिन्दू, मुसलमान और दोनों धर्मों के विभिन्न जातियों का मिश्रण है। हमारे गाँवों में हर जाति समूह एक विशेष कार्य करने में कुशल होते हैं और गाँव के हर घर में उनकी उपयोगिता उसी आधार निर्धारित होती है। जैसे बढ़ई-लकड़ी का काम, लुहार-लोहे (Iron) से सम्बंधित काम, कुम्हार (या भोजपुरी में कोहाँर)-मिट्टी के बर्तन बनाने काम इत्यादि। वैसे आज कल वैश्वीकरण के इस दौर में कार्य आवंटन की ये प्रथा गौण सी हो गयी है और हर जाती समूह के लोग अलग-२ तरह के काम कर रहे हैं; परन्तु ये व्यवस्था काफी हद तक मेरे बचपन के दिनों में अस्तित्व में थी

हमारे ही गाँव में रहते हैं झिंगुरी मिस्त्री - पूरा नाम तो झिंगुरी विश्वकर्मा था, परन्तु लोगों ने विश्वकर्मा हटाकर मिस्त्री कर दिया था। अब किसने किया, क्यों किया - नहीं पता। मिस्त्री थे तो लुहार पर अपनी २.५ इंच के बाजू और ६ इंच की छाती के साथ बढ़ई और लुहार दोनों का काम बखूबी करते थे। उनकी काया के बारे में बस इतना ही कह सकता हूँ की जब बैशाख और जेठ की दुपहरी में लू चलती थी तो डर लगता था की कहीं मिस्त्री दूसरे गाँव में उड़ कर ना पहुंच जाएँ :-)
झिंगुरी मिस्त्री 

मिस्त्री के साथ जुडी मेरी सबसे पुरानी यादों में जो बात मुझे याद आती है वो ये कि, मेरी दादी अक्सर हमें आखा/चलनी के छेद ठीक करवाने भेजा करती थीं - जो लोग खेती-बारी के काम से परिचित हैं, वो इस की अहमियत समझ सकते हैं। मिस्त्री अपने छोटे से झोपड़े में एक भट्टी जलाकर बैठे रहते थे और हम कौतुहल के साथ उनके काम को देखा करते थे। अपनी मरियल जैसी काया के साथ जब वो बड़ा हथौड़ा उठाते थे और जोर से "हियाँ" चिल्ला कर लोहे को पीटते थे तो ऐसा लगता था की दुनिया का आठवां अजूबा हो। आज तक ये बात समझ नहीं आई की मिस्त्री अपनी वजन से ज्यादा का हथौड़ा कैसे उठा लेते थे :)

मिस्त्री हर काम में माहिर थे - कुछ नया बनवाना है, पुराना मरम्मत करना है, कुछ जुगाड़ से सेट करना है; आप बोलो और वो कर के देते थे। सबसे ख़ास बात ये की वक़्त-बे-वक़्त जब भी आपको उनकी आवश्यकता हो वो उपलब्ध होते थे। मुझे याद है उन्होंने एक लकड़ी आलमारी १९९० के करीब बनायीं थी, वो इतनी मजबूत और भारी थी कि ५-६ लोगो की जरूरत पड़ती थी उसको एक जगह से दूसरे जगह ले जाने के लिए - अभी वही अलमारी तोड़ कर कुछ बेंच बने हुए हैं बैठने के लिए। और यही आलमारी उस समय हमारा सहारा बनी थी जब हम कच्चा घर गिरा कर नया बना रहे थे - खाने का सामान, राशन और रोजमर्रा की अधिकतर वस्तुएं इसी आलमारी में, उस १ साल के लिए बनाये गए झोपड़े में, पायी जाती थीं।

जब भी उनको याद करता हूँ तो साइकिल पर बैठा उनका बेजान सा शरीर और उस पर दम लगाकर पैडल मारते झिंगुरी मिस्त्री की तस्वीर सामने आती है। उनका मेरे घर से एक अलग ही लगाव था, किसी और को यदि मना भी कर दें, लेकिन हमारे परिवार को कभी नहीं। मुझे याद है, एक बार मिस्त्री की तबियत ख़राब थी और हमें अपने कच्चे घर (खपरैल वाले) में होली के पहले कुछ काम करना था (गांव में होली और दिवाली दोनों त्योहारों के पहले घर की सफाई, लिपाई-पुताई और मरम्मत होती है और कच्चे घरों में लकड़ी का काफी काम होता था)। मिस्त्री आँगन में सीढ़ी लगाकर एक कोने में लगे लकड़ी के एक हिस्से की मरम्मत कर रहे थे (उस हिस्से को गाँव की बोलचाल भाषा में मुहब्बत कहते हैं, क्यों कहते हैं पता नहीं ;)) और उसी समय सीढ़ी फिसल गयी और वो गिर गए। मेरी माता जी ने बिना देर किये खुद अपने हाथो से उनके पैर में बाम लगाया; मिस्त्री ने बहुत मना किया क्यूंकि एक ब्राह्मण का किसी दूसरे का पैर छूना उस समय की मान्यताओं के हिसाब से सही नहीं था। शायद इस घटना ने उनको मेरे परिवार के और भी करीब ला दिया था।

मिस्त्री को (या और भी काम करने वाले लोगों को) कभी पैसे नहीं दिए जाते थे - अनाज दिया जाता था। अनाज भी दो तरीके से १) जब भी कोई काम पूरा किया तो उसके अनुसार अनाज दे दिया और २) जब भी फसल कटती थी तब इनको बुला कर बोला जाता था की जितना भी ये बाँध कर उठा कर ले जा सकते हैं उतना ले जाएँ (इस प्रक्रिया को भोजपुरी में 'लेहना' बोला जाता है)। ये व्यवस्था हर उस व्यक्ति के लिए थी जो गाँव में अलग-२ काम करता था। लेहना की एक सबसे ख़ास बात होती है की आप इसे ले जाने के लिए शरीर का ही प्रयोग कर सकते हैं , साइकिल या बैलगाड़ी नहीं; ताकि आप एक सीमा से बाहर ना ले जा सकें। सबसे मजा आता था जब मिस्त्री लेहना लेने आते थे - उनसे तो बहुत काम उठ पता था, फिर हम लोग उनको थोड़ा परेशान करने के बाद, उनको साइकिल पर ले जाने देते थे।

इस बार घर गया था तो देखा कि झिंगुरी मिस्त्री अब भी वैसे ही दिखते हैं; पर अब बाज़ारी युग में उनके पास काम काम हो गया है. कच्चे घर नहीं रह गए तो होली-दिवाली का भी काम नहीं रह गया। फर्नीचर तो अब बड़े शहर से आ जाते हैं; बच्चों को चलना सिखाने के लिए अब कोई उनके पास लढ़िया बनवाने नहीं जाता। आखा/चलनी तो लगता है कि जैसे जरूरत ही ना हो; और हंसिया बनाने की तो बात ही नहीं क्यूंकि खेत तो अब मशीन से काट जाते हैं; और इसी लिए लेहना लेने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। मुझे नहीं पता की उनका जीवन यापन कैसे चल रहा है, पर इतना पता है की अब उनके "हियाँ" करके हथौड़ा मारना खत्म सा हो गया है। आप सोच रहे होंगे की इसमें कहानी क्या है, पर अहम मुद्दा ये है की गाँव तेजी से बदल रहे हैं और मिस्त्री जैसे, कार्य विशेष में निपुण लोगों का अगर ध्यान नहीं रखा गया तो इनके जीवन और बाकी गांव की जीवन शैली पर भी प्रभाव पड़ेगा।

अगले पोस्ट में मै ऐसे ही एक और खास व्यक्ति के बारे में बात करूँगा, तब तक के लिए विदा :-)